नम्रता और उसका बेटा (Mom-Son) -Namrata and his son sexy story

February 15, 2016 1 Comment
नम्रता और उसका बेटा (Mom-Son)

नम्रता अपने बिस्तर पर बैचेनी से करवटें ले रही थी. उसे पिछले दो घण्टे से नींद नही आ रही थी. इस समय रात के दो बज रहे थे. उसका पति हमेशा की तरह खर्राटें ले रहा था. लेकिन उसे नींद न आने की कोई और ही वजह थी. अपने पति के खराटें के साथ सोने की तो उसे आदत पड़ चुकी थी. आखिरकार वो इन्हे पिछले 18 सालों से सुन रही थी. उसे तो थोड़ी देर पहले दूरदर्शन पर देखी एक फिल्म ने बैचेन कर रखा था. यह शुक्रवार रात को दिखायी जाने वाली व्यस्क फिल्म थी. फिल्म की तस्वीरें बार-बार उसके दिमाग में आ रहीं थी. उसकी जिन्द्गगी भी फिल्म की नायिका से बहुत मिलती थी. उसे फिल्म में सबकुछ तो नही समझ में आया क्योंकि फिल्म अंग्रेजी में थी और उसे अंग्रेजी के कुछ शब्द ही आते थे. फिर भी वो फिल्म का मतलब तो समझ ही गयी थी. फिल्म कि नयिका का पति भी उसके पति की तरह अपना पुरूषत्व खो चुका था. पहले वो औरत 5 सालों तक बिना सम्भोग के रहती है फिर टूट जाती है और विवाहेत्तर सम्बन्ध बना लेती है.

पिछले दो घंटे से वो अपनी जिन्दगी के बारे में सोच रही थी. उसके पति अशोक 6 साल पहले अपना पुरूषत्व खो चुका था. बिना सम्भोग के रहते हुये उसे अब 6 साल हो गये थे. इन 6 सालों से जैसे-तैसे वो सहन कर रही थी पर आज की रात यह सब असहनीय हो रहा था. उसे लगा कि क्या वो जिन्दगी में फिर से कभी सम्भोग नही कर पायेगी.

कभी- कभी वो विवाहेत्तर सम्बन्धों के बारे में सोचती थी. पर उसे डर लगता था कि अगर किसी को पता चल गया तो? वो ये सब खतरे मोल नही लेना चाहती थी. पर सच यही था कि आज उसे एक पुरूष की जरूरत थी क्योंकि उसका अपना पति नामर्द था.

वो दिखने में बुरी नही थी. वास्तव में इस समय बिस्तर पर वो काफी आकर्षक लग रही थी. वो साड़ी में थी. प्रायः बिस्तर पर जाने से पहले वो गाउन बदल लेती थी पर आज उसका मन ही नही किया. उसका एक सुन्दर चेहरा था जो कि उदासी कि वजह से थोड़ा दयनीय लग रहा था. उसकी त्वचा का रंग एक आम सांवली भारतीय औरत जैसा था. बाल लम्बे थे. थोड़ी मोटापा पूरे शरीर पर चढ़ गया था. इससे उसका आकर्षण और भी बढ़ गया था. उसकी स्तन बड़े और अभी भी सुडौल थे जबकी अब वो 40 साल की हो रही थी और दो लड़कों की मॉ थी. उसका बड़ा बेटा नीरज 20 साल का था और छोटा राजेश 18 का.

उसे थोड़ी प्यास लग रही थी. इसलिये वो उठी और रसोई की ओर चल दी. वो रसोई में घुसने ही वाली थी तभी उसने अचानक देखा कि नीरज के कमरे से धीमी रोशनी आ रही थी. वो चक्कर में पड़ गयी क्योंकि नीरज कभी भी कोई लाईट जला कर नही सोता था. इसलिये वो समझ गयी कि नीरज जग रहा था. पर उसे आश्चर्य हुआ कि इतनी देर रात तक नीरज क्यों जगा हुआ है? वो उसके कमरे की ओर चल पड़ी. दरवाजा थोड़ा सा खुला था. उसने दरवाजा खोल दिया.

जो कुछ भी उसने देखा , उसे देख कर वो हतप्रभ रह गयी. नीरज बिस्तर पर बैठा था. उसकी पैंट और अन्डी घुटने तक उतरे हुये थे. एक हाथ से वो एक किताब पकड़े हुये था. उसके दूसरे हाथ में उसका कड़ा लिंग था. नीरज भी पूरी तरह हतप्रभ रह गया. कुछ समय तक दोनो को ही समझ नही आया कि क्या करें? फिर नीरज ने अचानक बिस्तर पर पड़े कम्बल से अपने आप को ढक लिया. वो बहुत ज्यादा शर्म का अनुभव कर रहा था. उसने अपने आप को दरवाजा बन्द न करने के लिये कोसा.

नम्रता को भी शर्म आ गयी. वैसे इसमें उसकी कोई गलती नही थी. आखिर वो तो कुछ गलत करते हुये नहीं पकड़ी गयी है. पर वो शर्म का अहसास जा ही नहीं रहा था. उसे लगा कि क्या उसे नीरज को कुछ कहना चाहिये, पर क्या? इस पर उसे कुछ नही सूझा. वो अपने कमरे में वापस चली गयी.

जैसे ही वो अपने बिस्तर पर लेटी , उसे अचानक अहसास हुआ कि उसकी योनि में गीलापन आ गया है. उसके मन में अपराधबोध जाग गया और यह भी पता चल गया कि उसे शर्म क्यों आ रही थी. चूंकि उसके शरीर में अपने ही बेटे की नग्नता को लेकर उत्तेजना दौड़ गयी थी इसलिये दिमाग ने उसे शर्म का अहसास करा दिया था.
अचानक ही , पैंट उतारे हुये बेटे की छवि उसके दिमाग में आ गयी और उसे पूरे शरीर में गुदगुदाहट भरी सनसनी का अनुभव होने लगा. इस गन्दगी को दिमाग से निकालने के लिये वो कुछ और सोचने लगी पर वो छवियाँ घूम- घूम कर उसके दिमाग में आने लगी. गुदगुदाहट भरी सनसनी और तेज हो गयी तथा उसे अब ये मानना ही पड़ा कि यह सब सोचना उसे अच्छा लग रहा था. उसने अपनी उत्तेजना दबाने की कोशिश की तो वो और तेज हो गयी. थोड़े समय बाद उसने यह संघर्ष छोड़ दिया.

वो अपने मन में अपने की बेटे के सख्त अंग की तस्वीर याद करने लगी. उसने उसके आकार के बारे में सोचा. वो उसके आकार से दंग रह गयी. आखिरकार, नीरज 11वीं कक्षा में पढ़ने वाला एक बच्चा ही तो था. तो भी उसका आकार नम्रता को अपनी हथेली से बड़ा लग रहा था.

जब ये सब उधेड़बुन उसके दिमाग में चल रही थी, तभी अचानक उसके ख्याल आया कि अगर वो चाहे तो उसका बेटा उसकी आवश्यकतायें पूरी कर सकता है. जिस चीज की उसे इस समय सबसे ज्यादा जरूरत है, वह उसे अपने बेटे से मिल सकती है. इस खयाल ने उसे और भी जयादा उत्तेजित कर दिया. वह जानती थी कि यह पाप है पर इस समय उसे यह सब इतना अच्छा लग रहा था कि उसने पाप-पुण्य के बारे में सोचना छोड़ दिया. उसे लगा कि जब यह ख्याल ही उसे इतना अच्छा लग रहा है तो वास्तविकता में कैसा लगेगा. वो लगभग आधे घण्टे तक यहीं सब सोचती रही. फिर अचानक ही उसकी इच्छायें नियंत्रण से बाहर होने लगी. वो बिस्तर से उठी और बाहर चली गयी.

उसके मन के किसी कोने में यह ख्याल भी आ रहा था “नम्रता , तू पागल तो नही हो गयी! क्या करने जा रही है तू! वो तेरा अपना बेटा है!!”. लेकिन वो इतनी ज्यादा उत्तेजित थी और 6 साल की अतृप्त कामोत्तेजना इतनी तीव्र हो चुकी थी कि उसने आत्मा की आवाज को अनसुना कर दिया. नीरज के कमरे की तरफ बढ़ते समय उसके मन में कई आशंकायें थी. क्या नीरज को वो आकर्षक लगेगी? क्या वो इसके लिये तैयार होगा? क्या इस विचार से वो घृणा करेगा? लेकिन अब उसे इस सब की कोई चिंता नही थी. वो अपनी जरूरतों के चलतें पागल सी हो चुकी थी. नीरज ने अब तक दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया था. उसने धीरे से खटखटाया. 2-3 बार खटखटाने पर दरवाजा खुला. कमरे में अंधेरा था पर धीमी रोशनी में वो नीरज को देख सकती थी जो उसे इस समय आया देख उलझन में पड़ा हुआ था. वो कमरे में घुस गयी और बल्ब जलाकर पीछे से कमरा बन्द कर लिया.

नीरज को यह लगा कि वो जरूर उसे डॉटने आयी है और बताने आयी है कि वो उसकी इस हरकत से कितना शर्मिन्दा है. अपना मुंह झुकाकर वो इसकी प्रतीक्षा करने लगा. लेकिन उसे ये सुनकर अचम्भा हुआ कि “ नीरज मैं तुझे डॉटने नही आयी हूँ. मैं दरअसल यहाँ सोने आयी हूँ. तेरे पापा वहाँ इतनी आवाज कर रहे हैं कि मुझे नींद नही आ रही है”. यह कह कर नम्रता बिस्तर पर लेट गयी. “चल अब तू भी आ जा”. नीरज ने उसे थोड़ी उलझन से देखा पर कहना मानते हुये उसके पास जाकर बैठ गया. नम्रता कुछ समय तक चुप रही फिर उससे पूछा “ नीरज, तू वो रोज करता है?”. उसने शरमातें हुये अपनी गरदन हिला दी. “वो किताब कौन सी है, जिसको तू देख रहा था उस समय? मुझे दिखा जरा”.

नीरज ने उसे आश्चर्य से देखा कि वो किताब क्यों मांग रही है. पर जब उसने दुबारा किताब मांगी तो नीरज ने गद्दे के नीचे से निकाल कर दे दी. नम्रता ने रोशनी जलायी और किताब खोल दी. यह नग्न लड़कियों के लुभावनी मुद्राओं के दृश्यों से भरी हुयी थी. “नीरज इनमें से सबसे अच्छा फोटो कौन सा लगता है तुझे?”, जैसे ही नीरज ने यह सुना उसे उत्तेजना का अनुभव हो लगा. यद्यपि वो अभी भी बहुत उलझन में था. जो कुछ भी हो रहा था, उस पर यकीन करना कठिन था-उसकी माँ रात के 4 बजे उसके पास लेटी हुयी एक गन्दी किताब के पृष्ठ पलटते हुये उसकी सबसे मनपसन्द फोटो के बारे में पूछ रही हैं! उसे अपनी माँ के इरादों के बारे में कुछ भी पता नही था, लेकिन यह लगने लगा था कि कुछ दिलचस्प होने वाला है. नम्रता ने एक बार फिर उससे पूछा “ बता ना, सबसे अच्छा कौन सा लगता है तुझे?”.

नीरज ने शरमातें हुये किताब ली और अपनी मनपसन्द फोटो वाला पेज खोल दिया. नम्रता ने फोटोवाली लड़की को देखा. वो एक बड़ी छातियों वाली विलासी लड़की थी. नम्रता ने लड़की की छातियों की तरफ इशारा करते हुये नीरज से पूछा “ ये इतने बड़े-बड़े है, इसीलिये अच्छी लगती हैं ना तुझे?” नीरज अबतक बुरी तरह से उत्तेजित हो चुका था. उसने अपनी माँ के चेहरे की ओर देखा. जो उसकी ओर बड़ी ममता और स्नेह से देख रही थी. फिर वो मुस्करायी और बोली,”नीरज इतना शरमा मत. मेरे सवाल का जवाब दे ना”. नीरज ने सिर हिलाया. बड़ी छातियों की वजह से ही वो लड़की उसे इतनी पसन्द थी.

नम्रता अब तक पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी. उसने सोचा कि यही समय वो पता करने का है जो वो अपने बेटे से चाहती थी. उसने साड़ी का पल्लू एक तरफ गिरा कर अपनी छातियों को अपने हाथों में भर लिया और बोली, “देख, मेरे तो इस लड़की से भी ज्यादा बड़े है”. यह सुन कर नीरज उसके चेहरे को एकटक घूरता ही रह गया. उसका आवेश अब चेहरे पर साफ झलक रहा था, यह देखकर नम्रता का साहस और बढ़ गया. “रूक मैं तुझे ब्लाउज खोल कर दिखाती हूँ”.

यह कह कर उसने तेजी से अपना ब्लाउज खोल दिया. ब्रेजरी में कस कर बन्धी उसकी छातियाँ सामने आ गयी. अब वो नीरज का एक हाथ ब्रेजरी के हूक पर ले गयी और खोलने को कहा. कपकपांते हाथों से नीरज ने हूक खोल दिया. नम्रता ने जल्दी से ब्रा उतारी और फर्श पर फेंक दी.

नीरज उसकी सुन्दर छातियों को एकटक घूरने लगा. वो बड़ी और सुडौल थीं तथा बाकि के शरीर की तरह ही साँवली थीं. चूचिया (निप्पल) बड़ी थी और सख्त लग रही थी. नीरज पहली बार किसी औरत की छातियाँ देख रहा था और ये छातियाँ किसी और की नही बल्कि उसकी अपनी माँ की है, यह ख्याल उसे बुरी तरह उत्तेजित कर रहा था. इतना आवेश उसने पहले कभी अनुभव नही किया था. अभी तक नीरज ने अपनी माँ के अलावा किसी ओर नजर से नही देखा था पर पहली बार उसे लगा उसकी माँ भी एक कामोत्तेजक औरत है. वास्तव में उसके स्कूल के दोस्त अगर उसकी माँ को देखेंगे तो “माल” बोलेंगे.


नीरज अब नम्रता की छातियों को छूने के लिये बेताब हो रहा था और जब नम्रता ने उससे शरारती आवाज में कहा,”नीरज, इनको छूने का मन नही कर रहा क्या तेरा?”, उसने तुरंत अपने हाथ नम्रता की छातियों पर रख दिये. छातियों पर फेरते समय उसके हाथ उत्त्तेजना से काँपने से लगे. उसके दिमाग में कहीं न कहीं यह था कि जो कुछ हो रहा है वो गलत और पाप है पर अत्यधिक काम-वासना के कारण अपनी माँ की तरह वो भी आत्मा की आवाज की परवाह नही कर रहा था. फिर भी उसे यह सोचकर डर लगा कि कहीं उसके पापा उठ गये और उन्होने ने उन लोंगो को इस तरह देख लिया तो! इसीलिये उसने अपनी माम से कहा,”मम्मी, पापा या राजेश जाग गये तो!”. नम्रता जानती थी कि जो कुछ भी वो कह रहा था वो नामुमकिन नहीं था. लेकिन अशोक बहुत गहरी नीन्द में सोता था इसलिये उसके उसके जागने की सम्भवना बहुत कम थी. उसका छोटा बेटा राजेश भी गहरी नीन्द में सोने वालों में था. इससे भी ज्यादा इस समय उस के ऊपर वासना इस कदर सवार थी कि अब वो रूकना नही चाहती थी. बड़ी मुलायम और शान्त आवाज में वह बोली,”उसकी चिंता मत कर. तेरे पापा रात को एक बार सोते हैं, तो फिर सीधा सुबह को ही उठते हैं. और तेरा छोटा भाई भी वैसा ही है.”

अब दोनों ही संयम खोते जा रहे थे. और अब तक उन्हें पता चल गया था कि उन्हें एक दूसरे की जरूरत है. नमता भी उतावली होने लगी थी. जल्दी से उसने अपने बेटे की शर्ट खोल दी. फिर पैंट खोल कर घुट्ने तक उतार दी. लिंग के कसाव के कारण उसकी अण्डी एक तम्बू की तरह लग रही थी. व्यग्रतासे नम्रता ने उसे नीचे उतार दिया. वो एकटक अपने बेटे के पूरे कसाव को देखने लगी. प्यार से उसने लिंग को हाथ में लिया और कोमलता से उसे सहलानी लगी. वो नही चाहती थी कि नीरज का अभी से वीर्यपतन हो. उसे लगा कि अब पूरे कपड़े उतारने का समय आ गया है. वो बिस्तर के पास खड़ी हो गयी और अपनी साड़ी उतार दी. इसके बाद पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया, पेटीकोट घुटनों से होता हुआ फर्श पर गिर पड़ा. फिर उसने पहले से ही खुले हुये ब्लाउज को उतार कर फर्श पर फेंक दिया. जब पेंटी की बारी आयी तो उसने सोचा कि ये काम नीरज को करने देते हैं.”नीरज ये उतार”. नीरज उत्साहपूर्वक उसकी पेंटी उतारने लगा. माँ की रोयेंदार झाड़ियाँ सामने आने पर उसने किसी तरह अपनी उत्तेजना को दबाया. उन रोयेंदार झाड़ियों के बीच ही उसकी माँ की योनि थी. वो इतनी सुन्दर लग रही थी कि वो उसे छूने के लिये उतावला हो गया.

अपनी पेंटी उतारने के बाद नम्रता ने अपने बेटे को पूर्ण नग्न होने में मदद की. फिर वो बिस्तर पर लेट गयी और नीरज से फुसफुसा कर बोली,”चल मेरे उपर आ जा”. नीरज के ऊपर आने पर नम्रता ने उसे अपनी बाँहों मे कस लिया. दोनों ने एक क्षण के लिये एक दूसरे को देखा. अब नम्रता ने फुसफुसा कर कहा,” नीरज, एक पप्पी दे अपनी मम्मी को”. यह सुनते ही उसने अपने होंट नम्रता के होंटों पर रख दिये. मुंह खोलने पर जब उनकी जीभे मिली तो ऐसे आनन्द की अनुभूति हुयी, जो पहले कभी भी नही हुआ था.

इस चुम्बन के बाद नीरज की झिझक खत्म हो गयी. नम्रता को अब उसे कुछ भी समझाने की जरूरत नहीं थी. उसने नम्रता के शरीर के हर हिस्से को बड़े ध्यान से देखा. उसके पूरे चेहरे को चूमने के बाद वो नीचे की ओर गया और छातियाँ चूसने लगा. नीरज ने उसकी छातियों को पुचकारा, गुदगुदाया,चूसा और सहलाया. अब नम्रता के मुंह से कराहट निकलने लगी. तब अचानक वो बोली, “नीरज एक पप्पी दे”. नीरज उसके मुख को चूमने ही वाला था कि वो मुस्करायी और बोली, “बुद्धु कही का, इन होटों पर नही, नीचे वाले होटों पर पप्पी चाहिये मुझे”. नीरज थोड़ी देर के लिये शरमाया फिर वो नीचे मुड़ गया. अपना मुह उसकी योनि के पास ले जा कर वो थोड़ी देर के लिये रूक गया. वहाँ से कस्तूरी जैसी गन्ध आ रही थी और उसे यह गन्ध बड़ी मादक लगी. उसने एक गहरी सांस नें इसे भर लिया और अपने होंट अपनी माँ की योनि के होंटों पर रख दिये. उसने कुछ समय पहले एक फोटो देखी थी जिसमें एक आदमी एक औरत की योनि चाट रहा था, उस समय उसे यह सब बड़ा घृणित लगा था. पर इस समय बड़ा प्राकृतिक और सुन्दर लग रहा था. नीरज ने जब योनि को फैलाया और योनि पर गुदगुदाया तो नम्रता तेजी से कराहने लगी. जल्दी ही उत्तेजना अनियंत्रित होने लगी, अब नम्रता अपने बेटे को अपने अन्दर चाहती थी. वो कराहते हुये बोली, “ नीरज अब अपनी मम्मी के अन्दर आ जा”. नीरज ने एक बार उसकी योनि को चूमा, फिर अपना चेहरा उसके चेहरे के पास ले आया. उन्होनें कुछ समय तक एक दूसरे को देखा, फिर नीरज ने अन्दर डालना शुरू किया. अपने अनुभवहीनता के कारण नीरज लड़खड़ाया तो नम्रता ने उसे अपने अन्दर घुसाने में मदद की. लेकिन नीरज ने तुरंत ही बाहर निकाल लिया. नम्रता ने पूछा,”क्या हुआ?”

नीरज ने उत्तर दिया,“ मम्मी कंडोम तो है नहीं. आप प्रेगनेंट हो गयीं तो!”. नम्रता ने अनुभव किया कि वो सच कह रहा था. वो प्रेगनेंट हो सकती थी. लेकिन काम-वासना के कारण उसे इसकी कोई परवाह नहीं थी. वो उतावली होकर मुलायम आवाज में बोली, “ मुझे परवाह नहीं उसकी. अभी बस मुझे तेरा प्यार चाहिये. चल फिर से अन्दर आ, जल्दी से. अगर प्रेगनेंट होती हूँ, तो होने दो”.

इसलिये नीरज ने एकबार फिर से उसकी योनि में अपना लिंग घुसा दिया. वो थोड़ा रूका फिर उसके अन्दर जाने लगा. इस समय नम्रता एक हाथ से उसकी पीठ सहला रही थी और दूसरा हाथ को उसके बालों में फिरा रही थी. यह सब बहुत समय तक नहीं चला. 2-3 मिनट के बाद ही नीरज उसके अन्दर फूट पड़ा. नम्रता को एक क्षण के लिये गुस्सा आया क्योंकि अभी वो संतुष्टि के आस-पास भी नहीं थी. लेकिन उसे जल्दी ही याद आ गया कि यह उसके बेटे का पहला मौका है. उसने उसके दुबारा कड़ा होने का इंतजार किया और इस बार जब उसने अन्दर किया, वो बोली, “नीरज इस बार आराम से करना. जल्दबाजी मत करना. ठीक है?. नीरज ने गरदन हिलायी. इस बार सब कुछ अच्छा गया. नम्रता को ऐसे चरम सुख का अनुभव हुआ जिसने उसके शरीर को कंपा कर रख दिया. नीरज का भी वीर्य-पतन हो गया.

उन्होनें 3 बार और संसर्ग़ किया और जब वो इससे निपटें किया तो 5.30 बज चुके थे. वो दोनों अब थका हुआ महसूस कर रहे थे. इससे भी ज्यादा, उन्हें इस बात का डर था कि अशोक या राजेश किसी भी समय उठ सकतें हैं. इसीलिये बेटे को अंतिम बार चूमने के बाद नम्रता ने अपने कपड़े उठाये और अपने कमरे में चली गयी.
उस दिन जब दोपहर में वो लोग अकेले थे हो फिर से संसर्ग़ किया. संसर्ग़ समाप्त के बाद नम्रता को एक अच्छा विचार आया. उस रात खाने के समय उसने अपने पति से खर्राटें के बारे में शिकायत की और कहा कि उसके लिये खर्राटें अब असहनीय हो गये हैं. इसीलिये अब वो दूसरे कमरे में सोयेगी. अशोक यह बात मान गया.
उस दिन के बाद से नम्रता दूसरे कमरे में सोने लगी. यह कमरा नीरज के कमरे के पास था और इसमें दोनों कमरो को जोड़ने वाला एक दरवाजा भी था. इसीलिये हर रात नम्रता चुपके से नीरज के कमरे में आ जायेगी या वो उसके कमरे में आ जायेगा और वो बिना डरे संसर्ग कर पायेंगे.
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गले तो मिल लो होली पर ! -Hindi Sexy Stories

February 15, 2016 Add Comment
गले तो मिल लो होली पर !  - Hindi Sexy Story

अपने मम्मी पापा के साथ सोनीपत में रहती हूँ। मेरी एक बड़ी बहन माला जिसकी शादी को अभी आठ महीने ही हुए हैं दिल्ली में है जीजू रोहित का कपड़े का एक्सपोर्ट बिजनेस है। मेरा रिश्ता भी दिल्ली में तय हो चुका है और मेरे होने वाले पति सुमित बंगलौर में सॉफ्ट वेयर इंजीनियर है। मेरे पापा का सोनीपत में बिज़नेस है।

अप्रेल में मेरी शादी निश्चित है। शादी की खरीदारी के लिए मैं मम्मी के साथ दिल्ली आई हुई हूँ दीदी जीजू के पास। जीजू बहुत मस्त हैं, दीदी को पांचवां महीना चल रहा है इसलिए उनसे तो घर का काम होता नहीं मम्मी ही अक्सर रसोई में लगी रहती हैं। बाकी कामों के लिए एक नौकरानी रखी हुई है। जीजू मेरे साथ अक्सर छेड़छाड़ करते रहते हैं। कई बार मेरे गालों को चूम लेते है और एक आध बार तो मेरे स्तन भी दबा चुके हैं दीदी के सामने ही, दीदी भी कुछ नहीं कहती।

एक दिन दीदी के सामने ही जीजू ने कहा- नीतू अब तो तेरी शादी होने वाली है शादी के बाद क्या होना है, तुझे पता है? कोई एक्स्पेरियंस है तुझे? मुझ से सीख ले कुछ ! मेरा भी कुछ काम बन जाएगा ! क्योंकि तेरी दीदी तो अब हाथ लगाने देती नहीं, तू ही कुछ मदद कर दे !

दीदी भी उन्हें प्रोत्साहित करते हुए कहती- हाँ हाँ ! इसे भी कुछ सिखा दो ! और जीजू मुझे अपनी बाँहों में लेकर भींच देते और यहाँ वहां छू भी लेते मुझे भी यह सब अच्छा लगता था लेकिन उपरी मन से जीजू दीदी की ऐसी बातों का विरोध करती थी धीरे धीरे जीजू की हरकतें बढ़ने लगी। अब तो वो दीदी के सामने ही मेरे होटों को चूम लेते और मेरे स्तन भी अच्छी तरह मसल देते थे।

इसी बीच होली आ गई। सभी उत्साहित थे होली खेलने के लिए। दीदी जीजू की भी शादी के बाद पहली होली थी और मेरा रिश्ता भी अभी हुआ था। जीजू पहले ही दिन काफी सारे रंग, अबीर, गुलाल ले आए थे। होली वाले दिन मम्मी तो रसोई में भिन्न भिन्न पकवान बनाने में लग गई थी सुबह से ही। जीजू ने मुझे और माला को बाहर बगीचे में बुला लिया होली खेलने के लिए। मैंने सफ़ेद टॉप और पैरेलल पहना था, दीदी ने गुलाबी सलवार-सूट पहना और जीजू टी-शर्ट और नेकर में थे।

पहले जीजू में मुझे थोड़ा सा गुलाल लगाया मेरे गोरे गालों पर, फिर दीदी को भी गुलाल लगाया। दीदी ने भी रोहित के चेहरे पर गुलाल लगाया तो जीजू ने दीदी को चूम लिया उनके होटों पर। दीदी मेरी तरफ देख कर थोडा शरमाई तो जीजू ने कहा- अभी उसकी बारी भी आयेगी ! इतना कहते ही जीजू ने मुझे पकड़ लिया और मुझे चूमना शुरू कर दिया पहले होटों पर, गालों पर फिर कानों और गले पर।

इतने में जीजू ने अपने होंठ मेरे टॉप के ऊपर मेर स्तनों पर रख दिए। मैं कांप उठी। उनके होंठ कुछ खुले और मेरे चुचुक का उभार उनके होटों में दब गया। मेरी तो जैसे जान ही निकल गई। मैंने जीजू को हल्का सा धक्का देकर हटा दिया। दीदी सब देख रही थी और मुस्कुरा रही थी।

लेकिन जीजू कहाँ मुझे छोड़ने वाले थे! उन्होंने मुझे फिर पकड़ लिया इस बार उनके हाथ मेरे पृष्ठ उभारों पर थे और होंठ मेरे होंठों पर। मैंने उनकी पकड़ से छूटने का भरसक प्रयत्न किया मगर कहाँ मैं कोमल-कंचन-काया और कहाँ बलिष्ठ-सुडौल जीजू ! जीजू मुझे चूमते चूमते और मेरे चूतडों को सहलाते हुए धकेल कर बगीचे में एक पेड़ तक ले गए और उसके सहारे मुझे झुका कर बेतहाशा मुझ से लिपटने लगे, मुझे चूमने चाटने लगे, मुझे नोचने लगे। मेरे शरीर का कोई अंग उनके हाथों से अछूता नहीं रहा। उनके हाथ अब मेरे टॉप में जा चुके थे। चूँकि मैंने ब्रा नहीं पहनी थी तो मेरे नग्न स्तन उनके हाथों में आ गए और मैं सिहर उठी। दीदी खड़ी यह सारा खेल देख रही थी और हंस रही थी।

अब तो जीजू के हाथ मेरे चूतड़ों से फिसल कर आगे की ओर आ गए थे मेरे तन-मन में काम ज्वाला भड़कने लगी थी। अब मैं चाह कर भी जीजू का विरोध नहीं कर पा रही थी।

अब जीजू ने मुझे वहीँ बगीचे में हरी घास पर लिटा लिया और मेरे टॉप को ऊपर उठा दिया। मेरा नग्न वक्ष-स्थल अब जीजू की आँखों के सामने था। उनके होंठ मेरे चूचुकों से खेलने लगे। दीदी दूर खड़ी यह सब देख कर मस्त हो रही थी की तभी मेरी नज़र अमित पर पड़ी जो दूर से यह सब नजारा देख रहा था।



मै आपको बताना भूल गई कि अमित सुमित का छोटा भाई है यानि मेरे देवर जो दिल्ली में एम बी ए कर रहा है। मुझे तनिक भी याद नही रहा था कि वो भी होली खेलने यहाँ आ सकता है।

अमित को देखते ही मेरे तो जैसे प्राण ही निकल गए। उसने मुझे देख लिया था जीजू के साथ इस हालत में ! मै तो गई बस !

मैंने जीजू को अपने ऊपर से धक्का दे कर हटाया और जल्दी से टॉप ठीक किया। इसी बीच मेरी हड़बड़ी देख कर दीदी ने भी अमित को देख लिया था। दीदी आगे बढ़ी और अमित स्वागत करते हुए कहा- आओ अमित ! होली की शुभकामनाएँ !

अमित आगे बढ़ा और दीदी को थोड़ा गुलाल लगाते हुए बोला- आप सभी को भी होली की बहुत बहुत शुभकामनाएँ !

दीदी ने अमित को बगीचे में ही रखी कुर्सी पर बैठने को कहा। तब तक मैं भी वहाँ आ गई थी। जीजू भी मेरे साथ साथ ही थे। अमित ने मेरे जीजू को होली की बधाई दी और रंग लगाते हुए बोला- बहुत मस्ती हो रही है होली की ! अमित की नजरें मेरी तरफ थी।

मैंने अपने आप को संयत करके अमित को होली की शुभकामनाएँ देते हुए उसके चेहरे पर गुलाल लगाया।

अमित बोला- सिर्फ रंग से काम नहीं चलेगा ! मिठाई-विठाई खिलाओ !

इसी बीच दीदी अन्दर जा चुकी थी मम्मी को अमित के आने की सूचना देने और नाश्ते का प्रबंध करने !

मम्मी बाहर आई तो अमित ने उनको भी होली की मुबारकबाद दी। मम्मी ने सुमित और उनके मम्मी पापा के बारे में पूछा कुछ देर बात करके मम्मी अंदर चली गई और दीदी ने हम सबको भी नाश्ते के लिए अंदर बुलाया।

जीजू आगे चल रहे थे, उनके पीछे मैं थी और मेरे पीछे अमित।

अचानक अमित ने मेरे पृष्ठ उभार पर चूंटी काटी मैने चौंक कर पीछे देखा तो अमित ने अर्थपूर्ण नज़रों के साथ अपने होंठ गोल करते हुए मेरी तरफ एक चुम्बन उड़ा दिया। मेरे मन में हलचल होने लगी।

नाश्ते के बाद अमित बोला- अब थोड़ी होली हो जाए !

दीदी ने कहा- हाँ चलो ! बाहर बगीचे में ही चलते हैं !

हम चारों फिर बाहर आ गए। मम्मी रसोई में ही लगी रही। बाहर आते ही अमित ने मुझे पकड़ लिया मेरे चेहरे और बालों में गुलाल भर दिया। दीदी जीजाजी तो कुर्सियों पर बैठ गए।

मैंने भी अमित के हाथ से रंग का पैकेट छीन कर उसके सर पर उलट दिया।

तब अमित ने पूछा ही था कि पानी कहाँ है, उसकी नजर पौधों को पानी देने के लिए लगे नल और ट्यूब पर पड़ गई। उसने अपनी जेब से एक छोटी सी पुड़िया निकाली और इसे खोल कर मेरे बालों में डाल दिया और नल खोल कर ट्यूब से मेरे सर पर पानी की धार छोड़ दी।

मैं एकदम गुलाबी रंग से नहा गई। मेरे कपड़े मेरे बदन से चिपक गए और मेरे स्तन, चूचुक, चूतड़ सब उभर कर दिखने लगे।

तभी अमित ने अपनी एक बाजू से मेरी कमर पकड़ ली और दूसरे हाथ से पीले रंग का गुलाल निकाल कर पहले मेरे चेहरे पर लगाया और फिर मेरी पीठ की तरफ से मेरे टॉप को उठा कर मेरी कमर को पूरा रंग दिया।

दीदी जीजू बैठे यह सब नज़ारा देख रहे थे।

अभी भी अमित का मन नहीं भरा था। वो मुझे दबोच कर उसी पेड़ के पास ले गया और उस पर मुझे झुका कर एक मुठ्ठी रंग मेरे पैरेलल में हाथ डाल कर मेरे चूतडों पर रगड़ दिया। इस पर मुझे बहुत गुस्सा आया जो मेरे चेहरे पर भी झलकने लगा। अमित ने यह देख कर कहा- भाभी ! वो आपके जीजू क्या कर रहे थे आपके साथ? और मैं तो आपका प्यारा देवर हूँ। अगर साली आधी घर वाली होती है तो भाभी भी तो है।

उसने मुझे पेड़ के पीछे इस तरह कर लिया कि दीदी जीजू से ओट हो जाए। फिर उसने अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए, लेकिन गुलाल लगे होने के कारण उसे कुछ मज़ा नहीं आया तो उसने मेरा टॉप आगे से उठा कर मेरे होंठ साफ़ किए और अपने होंठ मेरे स्तनों पर टॉप के ऊपर रगड़ दिए। फिर उसने जोर दार चूमा चाटी शुरू कर दी। मैं उससे छूटने का भरसक प्रयत्न कर रही थी।

अमित ने कहा- भाभी !प्यार से प्यार करने दो ! मैंने सब देख लिया है कि कैसे आप अपने जीजू के साथ लगी हुई थी।

अब अमित के हाथ मेरे स्तनों पर जम चुके थे। वो उन्हें बुरी तरह मसल रहा था । मेरे मुंह से उई ! आ ! आहऽऽ ! की आवाजें आने लगी थी।

मेरी आवाज़ सुन कर दीदी बोली- नीतू ! क्या हुआ ! और उठ कर हमारि तरफ़ आने लगी।

दीदी की आवाज़ सुन कर अमित ने अपने हाथ मेरे टॉप में से निकाल कर मेरे चेहरे पर रख दिए।

दीदी ने पास आ कर फ़िर पूछा-क्या हुआ नीतू?

इससे पहले मैं कुछ बोलती, अमित बोल पड़ा- कुछ नहीं दीदी ! भाभी की आंख में जरा उंगली लग गई है।

और हम तीनों जीजू के पास आकर बैठ गए और सामान्य बात चीत होने लगी। पर उन तीनों की नज़रें रह रह कर मेरी ओर उठ जाती थी, जैसे कुछ पूछ रही हों ! जीजू और दीदी की नज़रें जैसे पूछ रही थी कि अमित ने कुछ ज्यादा ही तो छेड़छाड़ नहीं की ! और अमित की नज़र पूछ रही थी- भाभी ! कुछ मज़ा आया?

बात करते करते अमित ने पूछ भाभी ! आज शाम को क्या कर रही हो?

मैंने सामान्य ढंग से कह दिया- कुछ खास नहीं !

तो अमित ने कहा- कल सुमित भैया का फ़ोन आया था, कह रहे थे कि अपनी भाभी को मेरी तरफ़ से कोई उपहार दिलवा देना उसी की पसन्द का ! शाम को बाज़ार भी खुल जाएगा, आप तैयार रहना मैं चार बजे तक आपको लेने आ जाऊँगा बाज़ार ले जाने।

दीदी और मैं एक साथ ही बोल उठी- अरे ! इसकी क्या जरूरत है !

तो अमित बोला- जरूरत क्यों नहीं है एक उपहार भैया की ओर से, एक मेरी ओर से और भाभी आप भी तो मुझे कोई उपहार देंगी, देंगी ना !

मैं उसकी तरफ़ ही देख रही थी और वो मेरी आँखों में झाँक कर पूछ रहा था। उसकी आँखों में शरारत साफ़ दिख रही थी।

आखिर मुझे हाँ करनी ही पड़ी।

थोड़ी देर और बातें करने के बाद अमित जाने के लिए उठ खड़ा हुआ और कहने लगा- भाभी एक बार गले तो मिल लो होली पर !

उसकी बात में प्रार्थना कम और आदेश ज्यादा झलक रहा था। मैं उठी और उसने मुझे अपनी बाहों में ले कर भींच लिया और दीदी-जीजू के सामने ही मेरे गालों को चूम लिया।

अब अमित जा चुका था। हम तीनों बगीचे में बैठे अभी कुछ देर पहले हुए सारे घटनाक्रम के बारे में सोच रहे थे। लेकिन कोई कुछ बोल नहीं रहा था।

दीदी ने चुप्पी तोड़ी- अमित ने बहुत गलत किया ! उसने आप दोनों को देख लिया था शायद ! इसीलिए उसकी इतनी हिम्मत हुई। उसने सुमीत को या किसी को इस बारे में बता दिया तो?

नहीं ! वो किसी से नहीं कहेगा ! वो भी तो कुछ ज्यादा ही कर गया। अगर उसे किसी को बताना होता तो वो यह सब ना करता, जीजू ने कहा।

इस पर मैं फ़ूट पड़ी- जीजू ! वो ज्यादा कर गया या आप ही कुछ जरूरत से आगे बढ़ गए थे? और दीदी आप? आप भी कुछ नहीं बोली जीजू को मेरे साथ बदतमीजी करते हुए?

जीजू बोले- बदतमीजी? अरे तुम इस बदतमीजी कहती हो? ये छोटी मोटी छेड़छाड़ ना हो तो साली-जीजा के रिश्ते का मज़ा ही क्या?

मैंने जीजाजी की बात का उत्तर देते हुए कहा- तो फ़िर अमित का भी क्या कसूर ! देवर भाभी का रिश्ता भी तो हंसी-मज़ाक, छेड़छाड़ का ही होता है !

दीदी माहौल गर्म होते देख बोली- चलो छोड़ो इस बात को ! चलो ! नहा-धो लो ! फ़िर शाम को बाज़ार भी जाना है।

फ़िर हम सब नहा लिए और खाना खा कर आराम करने लगे। थोड़ी देर बाद दीदी ने चाय के लिए पूछा और वो चाय बनाने चली गई तो जीजू की फ़िर जुबान खुली- वैसे नीतू ! आज मज़ा आ गया तुम्हारी चूचियाँ चूस कर ! तुम्हें भी तो कम मज़ा नहीं आया होगा?

मैं भड़क गई- जीजू अब बस भी करो ! बहुत हो चुका !

बहुत क्या हो चुका? अभी तो लगभग सब कुछ ही बाकी है, अभी तो कुछ भी नहीं हुआ !

अच्छा तो जो बाकी रह गया है वो भी कर लो ! लो आपके सामने पड़ी हूँ ! कर लो अपने दिल की ! कहते हुए मैं जीजू के बराबर में आ गई।

जीजू ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले- तुम तो गुस्सा होने लगी।

इतना कहते हुए जीजू ने मेरा हाथ सहलाना शुरू कर दिया और मुझे मनाने लगे। हाथ सहलाते सहलाते जीजू मेरे कन्धे तक पहुँच गए और अब मेरे कंधे और गर्दन पर हाथ फ़िरा रहे थे। उसके बाद मेरी और से कोई आपत्ति ना देख फ़िर उन्होंने मुझे अपनी बाहों में दबोच कर मेरे होंठों को चूमते हुए कहा- मेरी अच्छी नीतू !

इतने में दीदी चाय लेकर आ गई। मैंने दीदी से कहा- मम्मी को भी यहीं बुला लो !

तो दीदी ने बताया कि मम्मी सो रही हैं।

शाम को साढ़े तीन बजे अमित का फ़ोन आया, कहने लगा- भाभी ! तैयार रहना, मैं थोड़ी देर में आ रहा हूँ आपको लेने।

शाम को साढ़े तीन बजे अमित का फ़ोन आया, कहने लगा- भाभी ! तैयार रहना, मैं थोड़ी देर में आ रहा हूँ आपको लेने।

मैंने उसे कहा- दीदी और जीजू भी चलेंगे हमारे साथ, तुम एक घण्टे से पहले मत आना क्योंकि इतना समय तो लग ही जाएगा तैयार होने में!

इस पर अमित बोला- नहीं ! आप अकेले ही आएँगी मेरे साथ !

मेरे मन में शंका हुई, कहीं फ़िर कोई शरारत या कुछ और तो नहीं सोच रहा है अमित ! मुझे डर भी लग रहा था क्योंकि अमित ने मुझे जीजू के साथ देख लिया था। अगर उसने कुछ बता दिया अपने घर में या सुमित को तो क्या होगा !

फ़िर मैंने आग्रह किया कि सब इकट्ठे ही चलेंगे बाज़ार ! तो वो नहीं माना और मुझे बताया कि उसके पास मुझे दिखाने के लिए कुछ है।

पर मेरे बार बार पूछने पर भी उसने बताया नहीं कि क्या है और मुझे तैयार कर ही लिया अकेले चलने के लिए। दीदी, जीजू का तो वैसे भी कोई कार्यक्रम था ही नहीं जाने का।

अमित आया और हम दोनों गाड़ी में चलने लगे तो दीदी ने अमित से कहा- ज्यादा देर मत करना, दो घण्टे तक तो आ ही जाओगे?

इससे पहले मैं कुछ बोलती, अमित ने कहा- हाँ दीदी ! कोशिश करेंगे, पर देर भी हो सकती है।

और हम चल दिए। थोड़ा ही आगे गए थे कि अमित ने मेरे बाएँ कंधे पर हाथ रख कर मुझे अपनी ओर खींच लिया और मेरे गाल पर एक चुम्मा ले लिया। मुझे बहुत बुरा लगा- यह क्या कर रहे हो अमित !

प्यार से एक चुम्मी ली है भाभी ! अच्छा बताओ कहाँ चलोगी?

तुम बताओ? कौन सी मार्केट आज खुली होगी?

अरे मार्केट का तो बाद में देखेंगे। कुछ मौज-मस्ती हो जाए ! वैसे भी गिफ़्ट तो पहले से ही है मेरे पास आपके लिए !

क्या है?

उसने अपना मोबाइल निकाला और कुछ बटन दबाए और मेरे हाथ में दे दिया।

देखो भाभी ! आपके लिए !

मैंने देखा कि उसमें जीजू और मेरा होली का छेड़छाड़ की वीडियो थी। मैं तो सन्न रह गई। लगभग तीन मिनट की वीडियो होगी वह।

क्यों भाभी ? कैसी लगी मूवी?

मेरे मुँह में जैसे बोल ही नहीं रहा था। मैंने अमित की ओर देखा तो वो मुझे ही देख रहा था और हमारी नज़रें मिलते ही उसने मुझे फ़िर अपनी ओर खींच कर मेरे होंठ चूम लिए और उसका एक हाथ मेरी जांघ पर आ गया। मैंने जींस पहनी हुई थी। वो एक हाथ से गाड़ी सम्भाल रहा था और दूसरे हाथ से मेरी जांघ। मैंने उसका हाथ हटाने की कोशिश की तो बोला- भाभी किसी होटल में कमरा ले लेते हैं।

मेरी समझ में सब आ चुका था। अमित मुझे ब्लैकमेल कर रहा था और इस वीडियो का फ़ायदा उठाना चाह रहा था। मैं फ़ंस चुकी थी। किसी तरह से हिम्मत जुटा कर मैंने अमित से कहा- प्लीज़ अमित ! इस वीडियो को डीलीट कर दो !

अरे भाभी ! इसमें ऐसा क्या है जो तुम डर रही हो। मुझे तुम्हारा और तुम्हारे जीजू का खेल अच्छा लगा तो रिकॉर्ड कर लिया, बस !

चलो अब किसी होटल में जाकर हम भी ऐसे ही कुछ खेलते हैं !

अमित ! क्या कह रहे हो? मैं तुम्हारी होने वाली भाभी हूँ ! तुम्हें शर्म आनी चाहिए !

भाभी ! जब आपको शर्म नहीं तो मुझे काहे की शर्म? आप तो अपने जीजू के साथ खूब मौज-मस्ती कर रही थी ! खूब ऐश की होगी जीजू से अपने? पहली बार का मज़ा अपने जीजू को दिया या किसी यार से लुटवा ली अपनी जवानी?

अमित ! तुम्हें पता है कि तुम क्या बके जा रहे हो? गाड़ी रोको ! मुझे नहीं जाना तुम्हारे साथ कहीं भी !

नीतू डीयर ! अब तुम अपनी मर्ज़ी से नहीं मेरी मर्ज़ी पर चलोगी।

अमित आप से तुम पर उतर आया था।

बता ना ! किससे अपनी चूत का उदघाटण करवाया?

मैंने यह सुन कर अपना चेहरा दोनों हाथों से छुपा लिया और मेरे आँसू छलक पड़े। मैं सुबक पड़ी। इतनी अश्लील भाषा तो मैंने कभी सुनी ही नहीं थी।

अमित ने खाली सड़क देख गाड़ी एक तरफ़ लगाई और मेरे दोनों हाथ अपने दोनों हाथों में ले कर मुझे अपनी तरफ़ खींचा और मेरे गालों पर से मेरे आँसू अपनी जीभ से चाट लिए। मैंने पीछे हटने की कोशिश की मगर अमित ने और मज़बूती से मुझे पकड़ कर अपने ऊपर गिरा सा लिया और कहा- ज्यादा नखरे मत कर ! अगर ना-नुकर की तो अभी यह वीडियो सुमित को भेज दूंगा।

इतना कह कर अमित ने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए और चूमते चूमते मेरे होंठ ऐसे चूसने लगा जैसे कोई फ़ल खा रहा हो। अब तक उसका एक हाथ मेरे शर्ट में जाकर मेरे स्तनों से खेलने लगा। मैं रोने लगी थी। पर मैंने अपने आप को अमित के हवाले कर दिया। मेरा विरोध ढीला पड़ते देख अमित ने भी थोड़ी नरमी दिखाई और मुझे छोड़ दिया और मेरा एक हाथ पकड़ कर अपने लौड़े पर पैन्ट के ऊपर ही रख लिया। मैंने फ़िर अपना हाथ पीछे खींच लिया। अब अमित कुछ नहीं बोला और गाड़ी स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।

थोड़ा चलने के बाद अमित बोला- नीतू ! तुम इतने नखरे क्यों दिखा रही हो। तुम्हारे जीजा को तुम्हारे साथ देख कर मैं तो समझा था कि तुम आसानी से मान जाओगी, तुम तो ऐसे नखरे दिखा रही हो जैसे कोई कुँवारी कन्या हो।

मुझे डर भी लग रहा था और गुस्सा भी आ रहा था। मेरे मुंह से गुस्से में निकल गया- तुमने क्या मुझे कोई चालू लड़की समझ लिया है?

मैं अभी तक तुम्हारी हरकतें सह रही हूँ सिर्फ़ इस वीडियो के कारण ! जीजा-साली और देवर-भाभी के रिश्ते में यह सब थोड़ा बहुत चलता ही है और तुमने इसका गलत मतलब निकाला। ये रिश्ते बने ही इस तरह से हैं कि साली अपने जीजा से और देवर अपनी भाभी से हंसी मज़ाक में ही काफ़ी कुछ सीख सके। इसका मतलब यह नहीं कि वो सीमा ही लांघ जाएँ ! मैं मानती हूँ कि जो तुमने आज मेरे जीजाजी को मेरे साथ होली खेलते देखा वो इन पवित्र रिश्तों की सीमा का सरासर उल्लंघन था, पर जो तुमने किया उसमें क्या तुमने अपनी मर्यादा का ध्यान रखा?

अरे ! साली को तो आधी घरवाली कहा भी जाता है लेकिन हमारे हिन्दू समाज़ में भाभी को तो माँ तक का दर्ज़ा दिया गया है। भाभी तो एक ऐसी माँ की तरह होती है जिससे आप वो बात भी कर सकते हो जो अपनी माँ से कहते हुए हिचकते हो। भाभी तो एक माँ और एक दोस्त का मिलाजुला रूप है।

इसी प्रकार मैं ना जाने क्या क्या बोल गई अमित के सामने और वो चुपचाप सामने सड़क पर नज़र गड़ाए मेरी बात सुनता रहा और गाड़ी चलाता रहा। उसकी आँखों की नमी मैं देख पा रही थी।

अचानक उसने खाली सड़क देख कर गाड़ी रोकी और झुक कर मेरे पैरों की तरफ़ हाथ बढ़ाते हुए बोला- भाभी ! मुझे माफ़ कर दो ! जब मैंने आपको होली खेलते देखा तो पहले तो मुझे भी बहुत गुस्सा आया आपको उस हालत में देख कर, फ़िर मैंने सोचा कि चलो मैं भी बहती गंगा में हाथ धो लूँ ! मगर आप तो गंगा की तरह निकली जो अपने में मेरे और आपके जीजू जैसी गंदगी समेट कर भी पवित्र बनी हुई है।

नहीं अमित ! तुमने तो मुझे देवी बना दिया, काफ़ी हद तक गलती मेरी भी थी, मुझे जीजू को उसी समय रोकना चाहिए था जब वो अपनी हद पार करने लगे थे। मैं भी एक इन्सान हूँ, एक लड़की हूँ, उस वक्त मेरी अन्तर्वासना भी कुछ हद तक जागृत हो गई थी, इसी कारण मैं चाह कर भी जीजू और फ़िर तुम्हें वो सब करने से रोक नहीं पाई जो नहीं होना चाहिए था।

लेकिन जब तुमने मेरे साथ जबरदस्ती करने की और मुझे ब्लैक-मेल करने की कोशिश की तो मैं अपनी वासना से जागी।

मैं बोलती जा रही थी और अमित की आँखों से आँसू टप-टप गिर रहे थे। आत्म-ग्लानि उसे खाए जा रही थी। मैंने उसे इस तरह रोते देखा तो मेरा मन उसकी ओर से साफ़ हो गया और मैंने अपने दोनों हाथों से उसके आँसू पौंछते हुए उसे कहा अब जो हो चुका उसे भूल जाओ और चलो बाज़ार, मुझे अपना उपहार भी तो लेना है !

इतना सुनते ही अमित बिलख उठा और उसने मेरी गोद में अपना सिर रख दिया। उसके मुँह से बार बार यही शब्द निकल रहे थे- भाभी, मुझे माफ़ कर दो भाभी, मुझे माफ़ कर दो !

मेरी आंखे भी गंगा-जमना की तरह बह रही थी। मैंने उसका सर ऊपर किया और अपने गले से लगा लिया।

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February 15, 2016 Add Comment
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भाभी की बहन में अपना भी कुछ हक़ होता है यही सोच के में भैया की बारात में भाभी के घर गया वाहा भाई की शादी होने लगी और में भाई की शालियो के साथ मस्ती मजाक करने लगा, सभी मेरे साथ मिल जुल गए उनमे भाभी की जो सबसे छोटी बहन थी उसका नाम रश्मी था उसकी हाइट कम थी और उसका गांड बहार की और निकला हुआ था मुझे वो अच्छी लग रही थी उसका बटला भी काफी बड़ा था में उसको लाइन मारने लगा वो भी मेरे से सटने लगी में समझ गया की या तो सेट हो जाएगी l

हमारे यहाँ शादी रात भर होती है भाभी की छोटी बहन मेरे पास आई और बोली चलो खाना खा लो मैने कहा नहीं मुझे भूख नहीं है में उससे बात करने लगा मैने उससे पुचा तुम कोन से क्लास में हो उसने कहा में 10वी में हु हमलोग थोड़ी देर बात करने लगे तभी भाई की बाकि सालिया भी वह आ गई में सबसे बात करने लगा पर मेरी नजर रश्मी पे ही थी में किसी न किसी बहाने रश्मी से बात करने लगता था और उधर भाई की शादी हो रही थी मैने रश्मी से कहा चलो शादी देखते है और हम लोग शादी के पास चले गए और शादी देखने लगे रश्मी मेरे सामने ही खड़ी थी और थोड़ी थोड़ी देर में मेरी और देखती रहती थी l

में भी उसे घूरता रहता था फिर मैने सोचा की यही सही मोका है सब लोग शादी में व्यस्त है मैने रश्मी को इशारा किया वो साइड में आ गई मैने कहा मुझे तुमसे कुछ बात करनी है मैने उससे पूछा की तुम्हारे घर में कहा पर कोई आता जाता नहीं है तो रश्मी ने बताया की छत में कोई नहीं जाता मैने रश्मी से कहा चलो छत में जाते है और हम दोनों छत में चले गए छत में पहुचने के बाद रश्मी ने कहा कहो क्या बात है मैने कहा रश्मी तुम बुरा तो नहीं मानो गी न तो रश्मी ने कहा नहीं मानूंगी अब बोलो भी मैने रश्मी से कहा तुम मुझे अच्छी लगती हो आई लव यू तो उसने कहा में तो अभी तुम्हे अच्छे से जानती भी नहीं हु में अभी कुछ भी नहीं बोल सकती मैने जबरदस्ती रश्मी को अपने बाहों में लिया और उसे किस करने लगा l

वो हिलती दुलती रही फिर मैने मन में सोचा की अब इसे पकड़ लिया है तो इसे जोश दिलाना जरुरी है नही तो ये मेरे को फसा देगी इस कारन में उसे जोश दिलाने के लिए कपडे के उपर से ही उसकी चूत में ऊँगली करने लगा थोड़ी देर बाद रश्मी भी जोश में आ गई में रश्मी का बटला दबाने लगा और कहा रश्मी बस एक बार मेर साथ सेक्स कर लो तुमको अच्छा नहीं लगा तो कभी मत करना वो मान गई उसने कहा चलो में एक जगह जानती हु छत में ही एक रूम था हम दोनों वह गए और मैने रश्मी को नंगा किया और उसके बटले को चूसने लगा और उसकी चूत में ऊँगली करने लगा मैने रश्मी से पुचा तुमने कभी लंड देखा है तो रश्मी ने कहा नहीं देखा है मैने अपना लंड बहार निकला और रश्मी के हात में रख दिया रश्मी मेरे लंड को हिलाने लगी तभी रश्मी ने कहा अच्छा इसको लंड बोलते है l

मैने कहा हा तो रश्मी ने कहा मैने अपनी सहैली के घर बी ऍफ़ देखि थी उसमे इसको एक लड़की चूस रही थी मैने कहा तुम भी चुसो मजा आएगा और रश्मी मेरा लंड चूसने लगी फिर मैने रश्मी की चूत में अपने जीभ को फेरने लगा उसकी चूत बहुत ही मस्त थी थोड़ी देर तक मैने रश्मी की चूत चाटी फिर मैने रश्मी को लेटाया और उसकी चूत में अपना लंड धीरे धीरे डालने लगा आज तक मैने इतनी मस्त चूत कभी नहीं चोदा था में रश्मी को चोदता रहा और रश्मी आआआ आआआह्ह आआह्ह्ह्ह करती रही करीब आधे घंटे तक मैने रश्मी को चोदा फिर मैने रश्मी के चूत के बहार की अपना मुठ गिरा दिया और हम दोनों अपने कपडे पहन के शादी में चले गए ……..
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2015 New incest story in marathi font

February 14, 2016 Add Comment
2015 New incest story in marathi font
कोणे एके काळी अरबस्तानात अल्लादिन नावाचा एक तरूण रहत होता. विसेक वर्षाचा हा तरुण आपल्या विधवा अम्माबरोबर त्यांच्या जुन्या घरात अतिशय गरीबीत जीवन कंठत होता. त्याची अम्मा नूरबानु काही श्रीमंतांच्या घरात मोलमजूरी करून कसेबसे जीवन कंठत होते. अल्लादिनची अम्माला काहीच मदत नव्हती. तो आपला टिवल्याबावल्या करण्यात मग्न असायचा. झटपट श्रीमंत कसे होता ये‌इल ही दिवास्वप्ने पाहत तो दिवस घालवी.

एक दिवस रात्रीचे जेवण करुन मायलेक झोपायला जाणार तितक्यात दारावर कोणीतरी थाप मारली. अल्लादिनने दार उघडले. एक चांगले कपडे घातलेला मध्यमवयीन माणुस दारात उभा होता.

"कोणाचे घर शोधत आहात?" अल्लादिनने विचारले.

त्याच्याकडे रोखुन पहात, "अल्लादिन ?" त्या माणसाने आपल्या भसाड्या आवाजात उलट विचारले.

"हो. आपण कोण?"

त्या माणसाने अल्लादिनला मिठीत घेतले. "पोरा मी तूझा काका! तुझ्या बापाचा मी धाकटा भा‌उ अब्बास अलि"

पाहुण्याचा भसाडा आवाज एकुन त्याची अम्मा आतुन धावत आली."अब्बास अलि!" तिने पाहुण्याकडे एकदा नीट पाहिले व ती अल्लादिनला म्हणाली "बाळा हा तुझा चाचा अब्बास अलि. तुझ्या अब्बांचा धाकटा भा‌उ. त्याला सलाम कर."

अल्लादिनने सलाम केला व पाहुण्याला दार उधडुन घरात घेतले. चाचाने आत शिरताच अल्लादिनच्या अम्माच्या कमरेवर हात ठेवला हे त्याच्या नजरेतुन सुटले नाही. पण त्याच्या अम्माने अब्बासचाचाकडे पुर्ण दुर्लक्ष केले व ती आत निघुन गेली.

बैठकीवर ठाण मारत हुक्का पित चाचाने त्याच्या जादु‌ई प्रवासाच्या सुरेल गप्पा सांगायला सुरुवात केली. त्याने अल्लादिनला एक नकाशापण दाखवला व नाट्यपुर्ण आवाजात आपला खजीन्याचा शोध कसा चालु आहे हे सांगायला लागला. चाचाचा खजीना अजुनही त्या कागदावरच होता हे ओळखायला अल्लादिनला फारसा वेळ लागला नाही. इतके जग भटकुन आल्यावर चाचाला शोध लागला होता की तो खजीना या गावाच्या जवळच आहे.

अल्लादिनच्या अम्माला ना‌इलाजाने चाचासाठी खास जेवण बनवायला लागले. भरपेट जेवण हाणुन चाचाने आळोखेपिळोखे देत मोठी जांभ‌ई दिली व अल्लादिनच्या अम्माला विचारले "नूर तु दमली नाहीस का?"

"मुळीच नाही" असे म्हणुन नूर आत झोपायला निघुन गेली.

अल्लादिनही आपल्या खोलीत गेला. आत जाताच त्याने दार लावले व चिमणीच्या अंधुक प्रकाशात कपडे काढत झोपण्याची तयारी करू लागला. इतक्यात त्याला त्याच्या पलंगावर कोणी तरी बसल्याची जाणीव झाली.

"अम्मा?" त्याने विचारले.

"बाळा आजच्या दिवस मी तुझ्या खोलीत झोपली तर चालेल का? तुझा चाचा मला रात्री त्रास दे‌इल अशी मला भिती वाटते"

"अम्मा माझी कहीच हरकत नाही." अल्लादिनने चाचरत उत्तर दिले.

"ठिक आहे तु बाहेर जा. तुझे काम आवरण्याचे नाटक कर. पण तो झोपेपर्यंत तुझ्या चाचाला संभाळ."

अल्लादिन हो म्हणुन बाहेर गेला. बैठकीच्या खोलीत त्याचा चाचा तर ढाराढुर झोपला होता व मोठ्याने घोरत होता.

हलक्या पावलाने अल्लादिन आपल्या खोलीत परत आला. त्याची अम्मा त्याच्या अरुंद पलंगावर भिंतीच्या बाजुला पांघरुण घेवुन झोपली होती. पण तिचे डोळे उघडे होते. आता अल्लादिनला जरा विचार पडला. कारण त्याच्या लहानश्या खोलीत झोपायला पलंगाशिवाय जागा नव्हती. शिवाय झोपताना त्याला कपड्याशिवाय झोपायची सवय होती.

त्याच्या अम्माला त्याची अडचण समजली. "बाळा मी तुला जन्मल्यापासुन कपड्याशिवाय बघितले आहे. विसरलास? "

वरमुन अल्लादिनने आपला अंगरखा उतरवला. खालच्या लेंग्याची नाडी पटकन सोडली व तो पायातुन काढत अल्लादिनने पलंगात सुर मारला व पाघंरुणात शिरला. अरुंद पलंगावर त्याने अंग चोरायचा प्रयत्न केला तरी त्याच्या स्पर्श अम्माला झालाच.

बरेच वेळाने त्याला जाग आली तेव्हा तो पलंगाच्या एकदम कडेला आला होता. त्याला दुसरी जाणीव झाली ती त्याच्या शरीराला लागणाऱ्या अम्माच्या शरीराच्या उबेची. मग त्याला एकदम आठवले की त्याची अम्मा अब्बासचाचाच्या भितीने त्याच्या खोलीतच त्याच्या शेजारी झोपली आहे. तिचा हात त्याच्या मानेवर पडला होता व ती अगदी जवळच गाढ झोपली होती. त्याने अलगद अम्माचा हात दुर केला व आवाज न करता उठुन परसात जावुन मुतुन आला. त्याच्या चाचाचा घोरण्याचा आवाज घरभर घुमत होता. परत दाराला कडी लावुन हलकेच पलंगावर पडताना त्याला अम्माचे डोळे उघडे दिसले.

"काय झाले बाळा? तुला काही होत आहे का?"

"नाही अम्मा" तो लाजला

"तुला थंडी वाजत आहे. माझ्या जवळ ये झोपायला."

अंधारात काहीच दिसत नव्हते. त्याने डोळे फाड्फाडुन पाहीले. तो अम्माच्या आणखीन जवळ सरकला. अम्मा त्याच्याकडे पाठ करुन कुशीवर झोपली होती. तो तिच्या जवळ सरकला. त्याच्या हाताला तिने घातलेला पातळ झग्याचा स्पर्श झाला. त्याने तिच्या पाठीवर हात ठेवला. तिने तो हात उचलुन स्वतःच्या कमरेवर टाकला.

"अजुन जवळ ये" अम्मा बोलली. तो तिला चिकटुन झोपला. त्याची छाती तिच्या पाठीला लागली. अल्लादिन खुप लहान असताना त्याचे अब्बा अल्लाला प्यारे झाले. ते गेल्यापासुन लहानपणी अम्माला तो असाच चिकटुन झोपायचा. त्यात नविन काहीच नव्हते. ते बराच वेळ चिकटुन झोपले व एकामेकाच्या शरीराची उबेची मजा घेत होते. तिला कित्येक वर्षानी पुरुषाच्या शरीराची जवळीक मिळत होती.

मग त्याला जाणीव झाली की आपल्या पायांमध्ये आपले लिंग ताठरले आहे व ते मोठे होवुन अम्माच्या कुल्ल्याला टेकले आहे. तो शरमुन थोडा मागे झाला. पण त्याचे ते हत्यार अजुन मोठे होत राहीले व तिच्या कुल्ल्यावर आपटत राहीले. अम्मा जागी असुन काहीच विरोध करत नाही हे पाहुन त्याची उरली सुरली शरम नाहीशी झाली.

त्याची अम्मा काही न बोलता, न हलता त्याच्या लवड्याचे स्पंदन सहन करत राहीली. ती मागे होवुन आपला झगा वर केला. झग्याच्या आत काहीच नव्हते. ती उघड्या शरीराने त्याला अजुन चिकटली व कमरेवर आलेला त्याचा हात आपल्या पोटावर नेला.

बराच वेळ ते तसेच पडुन राहीले. त्याचा लवडा तिच्या नागड्या गांडीवर नाजुक फटके मारत राहीला. त्याने तिच्या पोटावरचा हात सरकवत तिच्या उघड्या स्तनांच्या खालच्या घळीत नेला व एक स्तन वर उचलुन खालुन दाबला. हिम्मत वाढवत त्याने अम्माच्या स्तनाग्राला बोट लावले व वर्तुळाकार फिरवले. तिच्या तोंडातुन अस्पश्ट सुस्कारा सुटला.
अचानच अम्मा हलली. तिचा हात खाली आला व तिच्या कुल्ल्यावर लागणारा अल्लादिनचा सोटा तिने आपल्या छोट्याश्या उबदार हातात पकडला व दाबला. आता अल्लादिनने "स्स्स्स......" केले. तिने काही वेळा तिच्या हातातला त्याचा लंड पुढेमागे केला. आपला एक पाय वर केला व ते भले मोठे धुड हळुहळु आपल्या पुच्चीच्या तोंडाशी नेला. तिची चुत पाझरुन ओली झाली होती. किंचीत वर खाली करत आपल्या पुच्चीला अल्लादिनच्या लवड्याच्या रेषेत आणुन त्याला आत घातला.

अल्लादिन खाली सरकला व त्याने बोटाने अम्माची चिकणी चुत चाचपली. चुतीचे ओले भोक सापडताच त्यावर बरोबर नेम लावला व हळु धक्का दिला. अम्माच्या चीकाने चिकट भोसड्यात त्याचा सोटा दुसऱ्याच फटक्यात आत गेला. तो मागे पुढे करत आपला लंड अम्माच्या फोद्यात ठोकु लागला.

कोणाही स्त्रीला चोदण्याची ही त्याची पहीली वेळ होती. ज्या फटीतुन तो ह्या जगात अवतरला होता त्याच फटीत आपला लंड घालताना त्याला अजिबात शरम वाटत नव्हती. आपल्या अम्मासारख्या सुंदर स्त्रीला चोदायचा आनंद तो मनमुराद लुटु लागला.

नूरबानू तिच्या पतीच्या निधनानंतर एकाकी जीवन घालवत होती. नविन विधवेला अब्बास अली सारख्या अनेक गुंडांनी फितवण्याचा प्रयत्न केला होता पण ती कोणाला बधली नव्हती. पण आज तरण्या अल्लादिनच्या अंथरुणात शिरल्यावर त्याच्या तरुण शरीराची उब मिळताच ती लोण्यासारखी विरघळली. तिच्या पतीपेक्षा लांब, मोठा व जाडजुड असलेला अल्लादिनच्या लंडाचा स्पर्श तिच्या मनातले बांघ तोडण्या‌इतका प्रबळ ठरला.

अल्लादिन तिला मागुन धक्क्यावर धक्के देत होता, त्याचा प्रत्येक धक्क्या बरोबर त्याचा लंड निर्दयपणे खोलवर शिरत होता व तिची चुत लंडावर आनंदाने प्रेमरसाचे फवारे सोडत होती. अल्लादिन अम्माचे दोन्ही स्तन एका हातात घेवुन त्यांची बोंडे पिरगळत अम्माचा आनंद वाढवत होता.

तिने आपला पाय वर केला ती आपल्या तुळतुळीत चुतीवर आपली बोटे फिरवु लागली. स्वतःचा दाणा चिमटीत घेताच तिने अत्यानंदाने एक किंकाळी फोडली व फळाफळा झडली व अल्लादिनच्या गोट्या आपल्या इवल्या हाताने दाबल्या. अल्लादिनच्या लवड्याला अम्माच्या पुच्चीत चाललेला कल्लोळ जाणवला. तिच्या पुच्चीच्या पाकळ्यांनी तो भला मोठा लवडा दाबुन धरला व त्याच क्षणी त्याने जोरदार पिचकारी अम्माच्या उदरात सोडली.


पुढे चालु.............







अल्लादिन व जादूचा दिवा भाग २


सकाळी लवकर उठुन अल्लादिन बाहेर आला तेव्हा अब्बासचाचा अम्मीच्या खोलीचा दरवाजा ठोठावण्याच्या बेतात होता. अल्लादिन त्याला बैठकीच्या खोलीत घेवुन गेला.

"चल मुला लौकर तयार हो. आपण खजीना शोधायला जावु." चाचा त्याला फारच घा‌ई करु लागला. अल्लादिनने उत्तेजीत झलेल्या चाचाला जरा शांत केले.

अल्लादिन फटाफट कपडे करुन तयार झाला. त्याच्या अम्मीने जेवण बांधुन दिले, व दोघे खजीन्याच्या शोधात निघाले. चाचा पुढे राहुन वाट दाखवत होता. गावच्या बाहेर वाळवंट ओलांडुन दोघे एका डोंगराच्या रांगेत पोचले. आपल्या पोतडीत हात घालुन चाचाने नकाशा काढला व बराच वेळ स्वतःशी पुट्पुटत तो त्या नकाशात डोके घालुन बसला. एकदाचे समाधान होवुन त्याने नकाशा परत पोतडीत भरला व नकाश्यात दाखवलेल्या गुप्त गुहेचा शोध चालु केला. बराच वेळ डोंगराच्या रांगेत शोधुनही चाचाला त्याची गुहा सापडत नव्हती. चाचा शिव्यांचा भडीमार करत अल्लादिनसह शोधत राहीला.

एका भयाण दिसणाऱ्या दरीच्या टोकावर चाचाने अल्लादिनला नेले. चाचाला हवी ती जागा एकदाची मिळाली. एक भली मोठी शीळा ताकद लावुन चाचाने बाजुला केली व त्याखाली लपलेल्या एका अरुंद घळीत तो काही वेळ डोकावला. "मिळाली एकदाची" असे ओरडत त्याने अल्लादिनला मिठी मारली. पोतडीतुन एक दोरखंड काढुन त्याने अल्लादिनच्या कमरेला बांधला. तो पुतण्याला बोलला,"मुला मी तुला या दोराने मी तुला खाली सोडतो. तु पटकन खाली उतर. खाली आत एक गुहा दिसेल. त्या गुहेत आपला खजीना आहे."

"त्या खोल गुहेत जायला लागेल? बापरे!" अल्लादिन थोडा बिचकला.

"अरे सोपे आहे. दोर लावुन खाली तु आत गेलास, तुझे काम केलेस की मी तुला परत ह्या दोराने खेचुन बाहेर काढीन."

"पण तु का तिथे जात नाहिस?"

"अरे ती गुहा तोंडाशी खुपच अरुंद आहे." चाचाने उत्तर दिले.

ना‌इलाजाने अल्लादिनला त्या गुहेत उतरावे लागले. त्या गुहेच्या अरुंद मुखातुन तो आत कसाबसा घुसला. गुहेत चिंचोळ्या मुखातुन अल्लादिन आणखी आत आत गेला. आता गुहेत पुर्ण काळोख होता. अल्लादिनने काडेपेटीने आपल्या जवळची मेणबत्ती लावली. येणाऱ्या मिणमिणत्या प्रकाशात आतले दृश्य पाहुन तो अवाक झाला. गुहेत अनेक पोती अस्ताव्यस्त पडली होती. प्रत्येक पोत्यात सोन्याची नाणी, अलंकार, रत्ने, मोती यांचा खच पडला होता.

अल्लादिनला अत्यानंदाने ओरडला," चाचा! आपण श्रीमंत झालो."

वरुन त्याला चाचाचा क्षीण आवाज आला,"तिथे एक जुनाट पितळेचा दिवा आहे. मला तो पाहिजे."

"अरे चाचा इथे जगातला सर्वात मोठा खजीना पडला आहे आणी तु भिक्कार दिवा काय मागतोस?"

"मला फक्त तो दिवा पाहिजे. आण तो इकडे"

"पण चाचा इथे तर कुबेराची दौलत आहे!"

"दिवा शोध आणी इकडे दे. तु माझे ऎकले नाहीस तर तुला मी ह्या गुहेतच तुला तडफडत मरायला ठेवीन" चाचा विचित्र आवाजात चिडुन ओरडला.

अल्लादिन चाचाकडे दुर्लक्ष करुन हिरे व सोने आपल्या खिशात भरत राहिला. अचानक त्याला जाणीव झाली की चाचाने वरुन दोराचे दुसरे टोक गुहेत सोडुन दिले व तो त्या घळीच्या तोडावरची शीळा परत लावत आहे. अलादिनच्या मनातली त्या दौलतीची लालसा क्षणात नाहीशी झाली व एका अनामिक भितीने तो थरारुन उठला. कोपऱ्यात पडलेला दिवा उचलुन गुहेच्या तोंडाशी पळत तो जोराने ओरडला, "चाचा मी तुला दिवा देतो पण मला बाहेर काढ!"

तो भिक्कारडा दिवा हातात घेवुन तो गुहेच्या मुखाशी वर पहात होता. पण गुहा बंद करुन त्याला जिवंतपणी गाडुन, चाचा निघुन गेला होता. अल्लादिन आपल्य चाचाच्या बोलण्यावर विश्वास ठेवल्याबद्दल स्वतःच्या कर्माला दोष देत रडु लागला.

उरलेल्या मेणबत्तीच्या उजेडात त्याने दुसरी वाट शोधायचा प्रयत्न केला. पण त्याला लगेचच जाणवले की अन्न व पाण्याशिवाय इथे तडफडत मरण्याशिवाय आता दुसरा मार्ग नाही. हातातली मेणबत्ती संपत विझायला आली.

त्याला त्याच्या अम्माची याद येवु लागली. तिचे प्रेम व तिच्या शरिराच्या उबेची आठवण झाली. तिचे म‌ऊ लुसलुशीत शरीर, तिचे त्याने काल कचकून दाबलेले म‌ऊ स्तन व त्याचा लवडा रगडलेले नितंब त्याला आठवत होते. त्याचा लवड्याने अनुभवलेली तिच्या योनीतील धग तो डोळे मिटुन अनुभवु लागला.

डोळे उघडले तसा तो भानावर आला. रडत भेकत अल्लादिन हातातला तो दिवा हाताने धुळ झटकत साफ करायचा प्रयत्न करु लागला. त्या दिव्यानेच त्याचा घात केला होता, आता निदान मेणबत्ती विझायच्या आत तो दिवा लावला तर थोडा त्याचा उजेड तरी पडेल, असा विचार करत त्याने हातानेच तो दिवा घासला.

अलादिनला वीज पडल्यासारखा आवाज व उजेड जाणवला व त्याच्या समोर धुर झाला. धुर विरला तसा त्याला एक अतिशय सुंदर मुलगी दिसली. झिरझिरीत पारदर्शक कपडे घातलेली त्या मुलीचे सगळे अवयव अलादिनला दिसत होते. तिचे टपोरे स्तन, सुडौल मांड्या व त्यामधली घळ त्याला दिसली.

"तुम्ही मला बोलवले, मालक? मी हजर आहे. काय आज्ञा आहे तुमची?" त्या सुंदरीने विचारले.

अल्लदिन उभा राहीला. हळु हळु चालत तो तिच्या समोर गेला. बिचकतच त्याने तिला हत लावला. एक खरी खुरी हाडामासाची मुलगी त्याच्यासमोर होती!! तो परत एक पा‌उल मागे आला व तिच्या बोलण्याचा विचार करु लागला.

"माझी आज्ञा? काय म्हणायचे आहे तुला?" त्याने त्या सुंदरीला विचारले.

"माझे नाव सुंदरी. मी या दिव्यातली जीनी आहे. तुमची इच्छा हीच मझी आज्ञ्या आहे. तुम्हाला काय हवे ते मी देवु शकेन. मग काय आज्ञा तुमची?

"अ....अ..मला भुक लागली आहे." अल्लदिन बारिक आवाजात बोलला.

त्याचे बोलुन संपले नाही तोच जीनीने टिचकी वाजवली व त्याच्यासमोर राजेशाही खाण्याच्या पदार्थाने भरलेले एक मेज अवतरले. अशी पक्वान्ने अल्लादिनने आयुष्यात खायचे सोडा, पाहिली पण नव्हती. तो हावरटासारखा त्या मेजवानीवर तुटुन पडला व पोटाला तड लगेस्तोवर खात राहिला.

पोटोबा शांत झाल्यवर त्याने सुंदरीकडे नवलाने पाहिले व विचारले, "तु मला माझ्या घरी घेवुन जाशील का?"

"अलबत! तशी तुमची इच्छा आहे का? सुंदरीने विचारले व हात उंचावत टिचकी मारायचा अविर्भाव केला.

"थांब.. थांब. त्या आधी माझी दुसरी इच्छा पुरी कर. अल्लादिन तिच्याकडे निरखुन पहात विचार करत बोलला.

"जी मालक! जशी तुमची इच्छा!" तिने उत्तर दिले.

"तू असे कर, तुझे ते नाटकातले कपडे उतरव! माझ्या जवळ ये, म्हणजे आपली एकमेकाची चांगली ओळख हो‌ईल." तो चाचरत बोलला.

"मी कपडे उतरवुन तुमच्याजवळ यावे अशी तुमची इच्छा आहे मालक?" सुंदरीने विचारले.

"हो" बोलुन तो तिच्याकडे पहात राहिला. तिने तिचा तलम अंगरखा व सलवार उतरवली व पुर्ण नग्न होवुन त्याच्या जवळ चालत आली व हात जोडुन उभी राहिली.

अल्लादिनचा त्याच्या डोळ्यावर विश्वास बसत नव्हता. इतकी नाजुक रुपगर्वीता त्याच्यासमोर नग्नावस्थेत उभी होती. अविश्वासाने त्याने हात लांब केला व तिला स्पर्श केला. खरच त्याचा हाताला तिच्या नितळ शरीराचा उबदार स्पर्श झाला. खऱ्या रक्तामासाची सौंदर्यवती त्याच्यासमोर त्याची वाट पहात होती!

त्याने तिच्या स्तनाला हात लवला. त्याच्या आ‌ईसारखे तिचे स्तन ओघळले नव्हते, तर गर्वाने चोचा वर करुन पहात होते. त्याने तिच्या नाजुक कमरेवर हात नेला. तिच्या बेंबीत बोट फिरवुन त्याचा हात तिच्या केसाळ योनीवर गेला. तिची योनी हातात भरुन घेतली व एक बोट तिच्या योनीत घातले. एकदम टा‌ईट! त्याच्या आ‌ईच्या फोदीसारखी तिची ढिली नव्हती. काही क्षणातच एका जवानीने मुसमुसलेल्या मुलीचे शरीर किती मनोरम असु शकते ते त्याच्या हातांना जाणवले. तिचे स्तन दाबुन त्याने त्यावर त्याचे ओठ नेले. मनोसोक्त स्तन चोखुन त्याने तिच्या केसाळ योनीवर नजर वळवली. गुडघ्यावर खाली बसुन त्याने तिच्या योनीचा सुगंध नाकात भरुन घेतला. तिची पाय फाकवुन त्याची जीभ योनी चाखु लागली.

कामासक्ती अनावर होवुन त्याने तिला गुहेच्या जमीनीवर झोपवले व तिच्यावर तो आरुढ झाला. आपले हत्यार तिच्या ओल्या योनीत घालुन तो तिला भोगु लागला. सावकाशीने, चवीने, कामुक आवाज करत तो तिच्या यौवनाचा आनंद घेत झवत आजुबाजुची परिथिती जणु विसरला.

तिने त्याला सुखाच्या टोकावर नेल्यावर त्याचा गळला व तो तिच्या अंगावरुन बाजुला झाला. "चल आता इथली सर्व संपंत्ती गोळा कर आणी मला माझ्या घरी घेवुन चल."

ती धिम्म हलली नाही. बसुन तिने त्याच्याकडे फक्त हसुन पाहिले. त्याने दिवा घासला. "चल आपण जावु इकडुन"

"चल बोल ’जशी आपली आज्ञ्या’ आणी काढ मला या भयाण जागेतुन! चल लवकर निघुया आपण!" तो ओरडला. "

तिने खेदाने डोके हलवले.

"माफ करा! तु जेव्हा मला झवत होतास, आपले प्रेम करणे चालु होतो तुझी शक्ती नाहिशी झाली." आता तु माझे मालक राहिला नाहिस." ती चक्क एकेरीवर आली!!

"ते ठिक आहे! मला काही दासी वगैरे नको. फक्त मला इकडुन घेवुन चल." अल्लदिन कावुन बोलला.

"माफ करा मी तुझे काहिच ऐकु शकत नाही"

"मग आपण इकडुन बाहेर कसे पडणार?" त्याने तिला चिडुन विचारले.

"अगदी सोपे आहे. या गुहेत एक अंगठी पडली आहे. ती अंगठी घास त्यातही एक जीनी आहे. तो माझ्या इतका ताकदवान नाही पण तुझे काम करेल." असे बोलुन ती अल्लादिनकडे पाहुन छान हसली.

अल्लादिनने आजुबाजुला पाहिले. त्या गुहेत अंगठ्यांचा खचकोळ पडला होता. "ती अंगठी मी कशी ओळखु?" त्याने हताश होवुन विचारले.

" तो तुझा प्रश्न आहे. त्यात मला काही करता येणार नाही" इतके बोलुन एका धुराच्या लोटात ती नाहिशी झाली.

बिचारा अल्लादिन परत अंगठी शोढायला लागला. एकेक अंगठी तो घासुन पाही व वेगळी ठेवे. त्याने हजारो अंगठ्या घासल्या पण काहीच होत नव्हते. मिनटे गेली, तास गेले. जीनी काही येत नव्हता. बिन कामाच्या अंगठ्यांचा मोठा ढिग झाला. आता तपासणी करायच्या फारच थोड्या अंगठ्या उरल्या. अल्लादिनची बोटे सोलुन निघाली, हात घासुन ठणकु लागला. त्याला प्रचंड भुक लागली. पण अल्लादिन श्रीमंतीची विरणारी स्वप्ने पाहत अंगठ्या घासत राहिला.

अचानक परत मोठा फटाका फुटल्यासारखा आवाज आला. गुहा मोठ्या उजेडाच्या झोताने उजळली व घुरातुन जीनी अवतरला. हा जीनी एक काळा कभिन्न हशबी होता.

तो हशबी जीनी काही बोलायच्या आत अल्लादिनने हुकुम सोडला, "चल मला इकडुन घरी घेवुन चल." आता त्याला परत एकदा केलेली चुक करायची नव्हती!!

त्याने जेमतेम दिवा हातात घेतला व त्याला आपण हवेत तरंगत आपल्या घरी आपल्या खोलीत पोचल्याची जाणीव झाली. तो धावतच आपल्या अम्मीला शोधायला घरभर शोधु लागला. त्याला तिला आपली सुरस कथा कधी तिला सांगतो असे झाले होते. घरात ती न दिसल्यामुळे तो तिच्या खोलीत पोचला. तिथले दृश्य पाहुन तो हैराण झाला. अम्मी तिच्या पलंगावर नागडी झोपली होती व तिच्यावर अब्बास चाचा झोपला होता व तिला हमसुन झवत होता.

त्याने चिडुन अंगठी घासली व जीनीला आज्ञ्या दिली "या माणसाला इकडुन घेवुन जा व समुद्रात टाकुन दे."

बिचारा अब्बास अलि! एका आनंदाच्या क्षणी त्याची उचलबांगडी झाल्याची जाणीव त्याला झाली व तो नाहिसा झाला. जीनी त्याचे काम करुन परत आला. "ठिक आहे" असे बोलुन अल्लादिनने त्याला निरोप दिला. जीनी वाकला व नाहिसा झाला.

अल्लादिन आपल्या नजरेसमोर अम्मीचे देखणे शरीर पसरलेले पहात होता. त्याने आपली तुमान उतरवली व तिच्यावर तुटुन पडला. हे सारे एका क्षणार्धात धडल्यामुळे तिला हेही समजले नाही की अबासच्या जागी अल्लादिन आहे, व तिच्या चुतीतला लवडा बदलला आहे. ती लय न बिघडवता आपले कुल्ले वर खाली करत झवण्याचा आनंद घेत राहिली. दोघेही झडले. अम्मी त्याच्या लवड्यातुन शेवटचा थेंब गळेपर्यंत त्याला चोदत राहिली.

"अब्बास तु इतके चांगले झवु शकतोस हे मला महित नव्हते." ती डोळे बंद ठेवुन चित्कारली. हे ऎकुन एकदम अल्लादिनचा लवडा म‌ऊ झाला तसे मग तिने डोळे उघडले.

"अल्लादिन तू! तू परत कधी आलास? अरे तु हे काय करतोस? मी तुझी अम्मी आहे. तुला सांगीतले होते ना की आपण परत असे करायचे नाही? उतर माझ्यावरुन."

अल्लादिनने प्रेमाने आपले बोट तिच्या ओठावर ठेवुन तिला चुप केले. "अम्मी आता आपण आपल्याला पाहिजे ते करु शकतो. आपण खुप श्रीमंत आहोत!!" त्याने सगळी कहाणी सांगीतली. मग अंगठी घासुन जीनीला बोलावले व खायला प्यायला मागावले. त्याला धन दौलत, दाग दागिने आणायला सांगीतले. अम्मीला व स्वतःला उत्तम उंची कपडे मागवले.

एकदाचे अम्मीला अल्लादिनचे सांगणे पटले. आपल्या अंगावरच्या रेशमी कपड्यांवरुन तिने हात फिरवला व तिला समाधन वाटले. तिने अल्लादिनकडे प्रेमाने पाहिले व ती खाली वाकुन गुडघ्यावर बसली. अल्लादिनचा छोटा झालेला लवडा तिने प्रेमाने हातात घेतला व दाबुन आपल्या तोंडात घेतला व चोखु लागली.

अम्मीच्या तोंडाची उब व तिच्या जीभेचा स्पर्शाने अल्लादिनचा लवडा परत कडक झाला. अम्म्मीकडे पाहुन त्याला एक एक युक्ती सुचली. त्याने आपल्या बोटातली अंगठी घासली व अंगठीतला हशबी जीनी उगवला. "माझा दिवा घेवुन ये." पापणी लवायच्या आत दिवा त्याच्या समोर हजर झाला. अल्लादिनने दिवा घासला. सुंदरी येवुन उभी राहीली. अल्लादिनने दोघाना जवळ बोलावले व त्याने त्यांच्या कानात खुसफुस केली व हुकुम दिला.

दोघांनाही हशबी जीनीने उचलले. तो व त्याची अम्मी अलगद तरंगत पलंगावर पोचले. सुंदरी अल्लादीनचा लंड चोखु लागली. हशबी जीनी अमीच्या मागे गेला व त्याने अम्मीचे पाय वर करुन फाकवले व त्याने त्याचा दहा इंची दांडका तिच्या फोदीत घातला. अम्मीनी सुंदरीच्या ताब्यातला अल्लादिनचा लवडा चोखायला घेतला. सुंदरीच्या वाट्याला अल्लादिनच्या गोट्या चाटणे आले. अल्लादिन सुंदरीला आपल्या चेहऱ्यावर ओढले व तिची सुगंधी चुतीत जीभ घालुन आतबाहेर करु लागला. चौघेही पलंगावर एकामेकाचे वेगवेगळे आवयव चाटत, चोखत, चोदत एकामेकाला आनंद देत होते. त्या आनंदाच्या भरात सुंदरी हे विसरली की ती आता अल्लादिनची दासी नाही! व तो सांगेल ते ती ऎकत राहिली!!

पुढे चालु....................
अल्लादिन व जादुचा दिवा ३

लवकरच अल्लादिन एक बडा व्यापारी बनला. अल्लादिना आपल्या अम्मीला घेवुन त्याने विकत घेतलेल्या नव्या महालात रहायला गेला. हा महाल एका तरुण व्यापाऱ्याने नुकताच आपल्या बायकोसाठी बांघला होता. पण तो बिचारा प्रवासाला गेला असता त्याची बोट वादळात सापडुन बुडाली. त्याच्या विधवेने नवऱ्याची कर्ज फेडायला तो महाल विकला. ती गरीब विधवा बानू या जगात एकटीच होती, त्यामुळे अल्लादिनच्या अम्मीने तिला आपल्या घरी ठेवुन घेतले.

बानू अम्मीबरोबरच रहायची. बिचारी नेहमी दुःखी कष्टी असायची. एक दिवस अल्लादिन कामाला दूर लांबच्या गावाला गेला होता. अम्मीला ताप येवुन तिचे डोके व अंग दुखत होते. अम्मीने बानूला बोलावले व तिला डोके चेपायला सांगीतले. बानूच्या नाजुक हातात जादू होती. ती जादू अम्मीला इतकी आवडली की अम्मीनी तिला आपले दुखणारे अंग चेपायला सांगीतले. मग तेल मालीश करायला सांगीतले. अंगाला तेल लावताना कपडे खराब होवु नये म्हणुन बानूने अम्मीला तिचे कपडे काढायला सांगीतले. बानूच्या हाताची जादु अम्मीच्या सर्वांगावर अशी काही चालली की अम्मीची डोके दुखी, अंग दुखी पार पळुन गेली.

दुसऱ्या दिवशी बानू आजारी पडली. मग काय! अम्मीने तिचे अंग चेपले, तेल मालीश केले, आणी काय काय केले. अल्लादिन गावावरुन परत ये‌ईपर्यंत त्या दोघी एकीमेकीची मदत करत जास्त वेळ पलंगावरच झोपुन होत्या. त्यांनी एकदुसरीची अंगे चेपली, चाटली, चोखली सर्व काही यथेच्छ्य केले.

मोठे नितंब संभोगले Marathi sex story

February 12, 2016 Add Comment
मोठे नितंब संभोगले Marathi sex story 
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  घरची थोडीफार जमीन होती पोटा पाण्याची तशी काळजी नव्हती. एक वर्षाचा मुला हि होता. भैरू पाटलाकडे आमची जमीन करायला होती. भैरू पाटील प्रामाणिक होता. भैरू पाटील हिशोबाच्या निमित्ताने कधी कधी घराला यायचा. पस्तीस छत्तीस वय असेल त्याचे. त्याची देह यष्टी भक्कम होती चेहरा रुबाबदार होता. घरात आला कि ऐटीत बसायचा पण मी त्याची नजर ओळखली होती आम्हा बायकांना पुरुषांची नजर लगेच समजते. भैरू पाटलाची नजर माझ्या मोठे नितंब वर सारखी वळत होती. नवर्याबरोबर गप्पा मारता मारता तो माझ्याकडे पाहत होता. पण मला त्याचा राग कधीच आला नाही. कारण माझे रूप होतेच तसे. मी शाळेत असताना तर मुलेच काय पण सर सुद्धा माझ्या मागे लागायचे.

मला एक दिवस कामा निम्मित शेतात जावे लागले. आणि शेतात गेल्यावर मला एकटीला पाहून भैरू खूपच खुश झाला. भैरू म्हणाला चला तुम्हाला मला दाखवून आणतो. असे म्हणत सगळा मला त्याने फिरवून दाखविला आणि शेतातल्या घरात नेले. तिथे त्याने अचानक मिठी मारली मी नकार देऊ लागले तसे तो म्हणाला अशा वाहिनी माझा जीव आहे तुमच्यावर मी आज तसा सोडणार नाही तुम्हाला काळजी करू नका असे म्हणत त्याने माझे स्तन दाबायला सुरुवात केली. मी करायचा तेव्हडा प्रतिकार केला पण पाटील ऐकायला तयार नाही. त्याने दार बंद केले तसे मी म्हंटले हे बघ पाटील मी त्यातली बी नाही आहे उगाच माझ्या मागे लागू नकोस. अशा वाहिनी एकदा या भैरू पाटलाची चव तरी चाखून बघा आवडले तर ठीक नाहीतर परत आयुष्यात मी तुमचा नाद करत नाही. असे म्हणत त्याने आपल्या अंगावरची कपडे काढायला सुरुवात केली. माझे मोठे नितंब पहातच राहिला.

मी खुळ्यासारखी बघतच राहिले अंगात उरलेली चड्डी पण काढून टाकली आणि पाटील पूर्ण नागडा झाला. त्याच्या लवड्या कडे माझे लक्ष गेले. त्याचा लवडा खूपच मोठा होता. आता माझ्या लवड्याची चव बघा असे म्हणून त्याने मला जवळ घेतले माझा हात धरून आपल्या लवड्या वर ठेवला. माझ्यातल्या वासना लगेच जाग्या झाल्या. त्याच्या मोठ्या लवड्या ला स्पर्श होताच मी भुलून गेले. त्याने माझ्या अंगावरची कपडे काढायला सुरुवात केली. माझ्या गोर्यापान अंगाला दाबत तो माझी पट पट चुंबने घेऊ लागला. माझी स्तने त्याने चांगलीच दाबून काढलीत. मग मला उलटी फिरवून उभी केईल आणि तो मागून चिकटून उभा राहिला व माझे मोठे नितंब दाबू लागला. हात पुढे करून माझी स्तन हातात धरून म्हणाला वाहिनी फार दिवस झाले मी याची वाट पाहत होतो आज मला संधी मिळाली. असे म्हणत आपला लवडा माझ्या मोठे नितंब वरून फिरवू लागला.

त्याने मला खाली उताणी झोपवली आणि माझ्या मांड्या फाकवून तो माझी योनी न्याहाळू लागला. त्याची बोटे माझ्या योनीत आत बाहेर करू लागल व माझ्या तोंडाची चुंबने घेत खाली सरकत त्याने सरळ माझ्या योनीत तोंड खुपसले आणि योनी चाटायला सुरुवात केली. आज पर्यंत माझी योनी चाटली नव्हती त्यामुळे ते मला खूपच मस्त वाटू लागले वेगळाच अनुभव आला आणि खूपच आवडला. मी माझ्या मांड्या आणखीनच फाकवल्या आणि त्याने पाच मिनिटे माझी पुची चोकून काढली. मी म्हसी सारखी वाकले आणि भैरू माझे मोठे नितंब धरत मागे आला. नितम्बाची थोडी चुंबने घेत त्यावरून हात फिरवला. आणि वितभर लाम्बडा लवडा माझ्या पुचित सारला. माझे मोठे नितंब पाहून त्याचा वेग वाढला. योनीला पाणी सुटल्याने तो सटकन आत शिरला. त्याने जोराने दणके द्यायला सुरुवात केली. मला खूपच मस्त वाटत होते. त्याचा सगळा लवडा माझ्या योनीत सरत होता. मी हि मागे पुढे करत तो खोलवर घालून घेऊ लागले. व विर्याचा फवारा त्याने माझ्या पुचित सोडला.

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